Tuesday, 1 September 2020

शादी के बाद का घर

 शादी केबहुत लंबे समय के बाद एक कविता (कविता है भी या नहीं, नहीं जानता) आप सब की मुहब्बत के हवाले।


शादी के बाद का घर


सब मेहमान लौट चुके हैं

बस एक दो ठहरे हुए हैं

शादी के बाद का घर देखा है कभी?

काट खाने को दौड़ता है वो

एक दो लाइट्स हैं जो बुझे मन से जग रही हैं

कोशिश कर रही हैं थोड़ी रौनक लाने की

टेंट वाला छोड़ गया था 

कह रहा था सुबह लड़का उतार लें जाएगा

दो चार घंटों में कौनसा बिल आ रहा है?


टेंट तो उतार लिया उसने

बस अब तो उखाड़े गए पाइप के निशान बाकी है

गीली जमीन पर गोल गोल

कुछ डिस्पोजल उड़ रहे हैं इधर उधर

जूठे बचे खाने पर कुत्तों का समर चल रहा है

टेंट वाले की कुछ कुर्सियाँ बिखरी पड़ी हैं

गद्दे बिछे हुए हैं बैठक में

बिल्कुल खाली, कोई नहीं सोया आज उन पर।

मिठाइयों के टुकड़े बिखरे पड़े हैं

जो बड़े चाव से बनाई थी

एक मिठाई तो बड़ी बहन की जिद्द पर बनी थी

ज़्यादा है तो बिखेर दी

कम होती तो उठा के फूक मार के खा लेते।


डेकोरेशन लाइट जग बुझ रही है

जैसे शोर करना चाह रही हो लेकिन

आवाज नहीं निकल रही

सब ओर सन्नाटा है

बस अंदर भूचाल आया हुआ है

मेहमान आये थे तो खुशी थी

गए थे तब भी खुशी ही थी

लेकिन अब जाने क्या हुआ है

कुछ तो मर ही जाता है अंदर,

विदा होने के बाद।


कितने अच्छे लग रहे थे

स्वागत में बिछे फूल

अब मरे पड़े हैं

वक़्त गुज़र जाने पर

हर हसीन चीज का हश्र बुरा होता है

सब से बदसूरत लगती है

वक़्त के बाद हर खूबसूरत चीज।


एक कोने में दो स्पीकर पड़े हैं

उन पर कुछ चाय के जूठे कप रखे हुए हैं

बच्चे ले आये थे डांस करने के लिये

चार पाँच दिन से नाच रहे थे सब इनके आगे

आज किसी ने संभाल कर भी नहीं रखे

हर शादी में इनके साथ भी यही होता होगा

अंत में डाल दिये जाते होंगे किसी कोने में।


घरवाले भी सो गए थक हार कर

जिसको जहाँ जगह मिली वहीं

बस मुझे ही नींद नहीं आ रही

आये भी कैसे

बेटी गई है ना घर से

पहली बार, हमेशा के लिए

बिना कहे कि 'टाइम से घर आ जाऊंगी।'

Thursday, 27 August 2020

Bishnoi tree Huggers:🙏निवन प्रणाम 🙏 #सिर_साटे_रूंख_रहे,तो भी सस्तौ जाण।





 🙏निवन प्रणाम 🙏

             हरे वृक्ष #खेजड़ी के लिए #अमृता_देवी_विश्नोई के एक आह्वान पर #363 लोगों ने अपनी #अमर_शहादत की घटना आज भी #विश्नोई_समाज ही नहीं बल्कि समूचे #विश्व_को_प्रकृति_और_पर्यावरण बचाने की प्रेरणा दे रहा है। खेजड़ली गांव में #चिपको_आन्दोलन की प्रणेता अमृतदेवी बिश्नोई तथा उनकी तीन मासूम पुत्रियों #आसु_रतनी_भागु ने पेड़ों की रक्षा के लिए पेड़ों से लिपट कर एक आह्वान किया .... 

#सिर_साटे_रूंख_रहे,तो भी सस्तौ जाण। 

अर्थात पेड़ बचाने के लिए यदि शीश भी कट जाता है तो यह सौदा सस्ता है।


जोधपुर शहर से 28 किलोमीटर दूर खेजड़ली वो धरती है जहां 15वीं सदी में #विश्नोई_समाज_प्रर्वतक_गुरु_जम्भेश्वर के 29 नियमों की सदाचार प्रेरणा से #363 महिला-पुरुषों ने पर्यावरण संरक्षण को अपना धर्म मानते हुए #290_वर्ष_पूर्व_सन_1730आज ही के दिन अपने प्राणों का बलिदान किया। 

प्रकृति संरक्षण को महत्व देने वाले गुरु जम्भेश्वर के बताए 29 नियमों में #जीव_दया_पालणी, #रूंख_लीलौ_नहि_घावै और अमृता देवी का एक नारा #सिर_सांठै_रूंख_रहे_तौ_भी_सस्तौ_जाण का अनुसरण विश्नोई समाज सदियों से करता आ रहा है। मारवाड़ और राजस्थान के विभिन्न जिलों सहित हरियाणा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तराखण्ड, उत्तरप्रदेश, पंजाब आदि राज्यों में बिश्नोई समाज की विभिन्न संस्थाओं की ओर से खेजड़ली के 363 शहीदों की स्मृति में  अमृता देवी उप वन-वाटिका स्थापित हो चुकी है। तथा पौधे लगाकर उनकी नियमित देखभाल हो रही है।

 

Wednesday, 19 August 2020

जाम्भोजी के बारे संक्षिप्त विवरण:श्री आईदानसिंह भाटी


‘सिर साटै ई रूंख रहै तौई सस्तौ जाण’ 

श्री जांभोजी महाराज


जाम्भोजी का जन्म नागौर परगने के पीपासर ग्राम में हुआ था | उनकी जन्म तिथि भाद्रपद वदी अष्टमी, सोमवार, कृतिका नक्षत्र में विक्रमी 1508 में हुआ था | इनकी माता हाँसादेवी (केसर नाम भी मिलता है) छापर के यादववंशी भाटी मोहकमसिंह की पुत्री थी | पिता लोहटजी पंवार (परमार) राजपूत और सम्पन्न किसान थे| जाम्भोजी के दादा रोळौजी अथवा रावळजी प्रसिद्ध व्यक्ति थे | उनके दोपुत्र थे – लोहटजी और पूल्होजी | तांतू नामक एक लोहटजी के बहन भी थी,जिसका विवाह जैसलमेर रियासत के ननैयू ग्राम में हुआ था | लोहटजी का समाज में पर्याप्त मान-सम्मान था, पर संतान सुख नहीं था | 

लोकाख्यानों के अनुसार वे जब बन में एक दिन गायें चरा रहे थे, उन्हें ‘अगम-पुरुष’ योगी मिला जिसने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा कि तुम्हारे घर में ‘देव’ पुत्र रूप में अवतरित होंगे | वे जीव-उद्धार के लिए आयेंगे, तुम कोई इचरज मत करना, उदास मत होना, मन में कोई अंदेशा(शंका) मत लाना | योगी ने हाँसाजीको घर के दरवाजे आकर उसे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया| हाँसाजी योगी के लिए भिक्षा लेने घर के अंदर गई और लौटी तो वहां योगी का कोई चिन्ह तक नहीं दिखा| लगभग 60 वर्ष की आयु में लोहटजी को पुत्र-रत्न प्राप्त हुआ था | किंवदंतियों के अनुसार न तो बालक ने जन्मघुट्टी ली, न ही जमान पर पीठ के बल लेटा | लोहटजी की इकलौती संतान होने के कारण वे माता-पिता को अतीव प्रिय थे | लोकाख्यानों के अनुसार वे बाल्यावस्था में मौन ही रहते थे, इसलिए लोग उन्हें गूंगा भी कहने लगे थे | कभी कभी वे कुछ ऐसा कर दिखाते थे कि लोग अचम्भा करते थे, इसी कारण लोग उन्हें ‘जम्भा’ कहने लगे |

जाम्भोजी की परम्परा में वील्होजी सुप्रसिद्ध कवि हुए हैं| अपने एक कवित्त में उन्होंने कहा है कि जाम्भोजी ने सात बरस बाळ-लीलावाँ में बिताया, 27 बरस तक गायां चराई और 51 बरस शब्द-कीर्तन में बिताये | वील्होजी के अनुसार – ‘जाम्भ्जी की पलक नहीं झपकती थी, वे पीठ के बल नहीं सोते थे, खाते पीते भी नहीं थे | परेशान इनके पिता लोहटजी इन्हें श्मशानसेवी तांत्रिक के पास ले गए, किन्तु उसके सारे प्रयत्न व्यर्थ गए | वह जाम्भोजी की आध्यात्मिक प्रतिभा से प्रभावित हुआ | इसी अवसर पर कहते हैं जाम्भोजी ने अपना पंला ‘सबद’ कहा| लगभग 16 बरस की वय में ये गोरखनाथ के पंथ वालों के संपर्क में आए और उनसे प्रभावित भी हुए | आपने विवाह की बात उठने पर मना कर दिया, तथा आजीवन ब्रह्मचर्य पालन का वृत लिया | 1540 विक्रमी में लोह्टजी का देहावसान हो गया, तथा पांच माह पश्चात ही माता हाँसादेवी भटियाणी भी गुजर गई | फिर जाम्भोजी ने घर त्याग दिया और ‘समराथळ-धोरा’ पर जाकर तपस्या करने लगे |

संवत 1542 की कार्तिक वदी अष्टमी को इन्होने ‘कलश-स्थापन’ कर ‘विष्णु’ मंत्र का जाप करने को कहा और अपने पंथ को ‘विष्णुई’ अथवा लोकभाषा में ‘बिश्नोई’ कहा| संवत 1542 में भयंकर अकाल भी पडा था, तब लोग उनके आश्रम में आने लगे थे | जम्भोजी ने उनका पोषण किया, तथा उन्हें ‘विष्णु’ मंत्र देकर पंथ में सम्मिलित किया | उनके काका पूल्होजी के मन में उठी शंकाओं का भी उन्होंने समाधान किया और उन्हें ही सर्वप्रथम अपने पंथ में दीक्षित किया था | अपनी बुआ ताँतू को भी उन्होंने नवलमंत्र देकर अपने धर्म में शामिल कर लिया था | कालांतर में उनके शिष्यों ने 29 नियमों की स्थापना की और उस पर चलने का आग्रह किया | नासमझ लोग इन बीस और नौ नियमों को मानने के कारण बिश्नोई शब्द की उत्पति मानते हैं, यह भ्रामक धारणा है | विष्णु ( राम की तरह एक निराकार ब्रह्म का नाम ) को भजने वाला बिश्नोई- ‘विष्णु विष्णु तूँ भण रे प्राणी |’ का सूक्त ही इस शब्द ने मूल में है |

जाम्भोजी के समय के अनेक प्रवाद और लोकाख्यान प्रचलित हैं | राठौड़ राव दूदा जोधावत की जाम्भोजी से भेंटवार्ता हुई थी और जाम्भोजी से वे अत्यंत प्रभावित हुए थे, उन्हें जाम्भोजी ने काठ की मूठ की तलवार धारण कराई और अहिंसावृत पालन का उपदेश दिया था | राठौड़ राव जोधा को उन्होंने ‘बैरीसाल नगाड़ा’ दिया था, जो कालान्तर में बीकाजी बीकानेर ले गए, जिसकी वहां दशहरा और दीपावली को बीकानेर नरेश पूजन करते हैं | जूनागढ़ में यह नगाड़ा आज भी सुरक्षित है |

बीकानेर के राजकीय झंडे में मूलमंत्र के ऊपर खेजड़े का वृक्ष अंकित है, जो राज्य में जाम्भोजी की मान्यता का सूचक है –

‘करूं रूँख प्रितपाळ, खेजड़ा रावत रखावै’

जोधपुर के राव सातल ने बिश्नोई-पंथ के अनुयायियों को सर्वथा कर मुक्त करना चाहा था किन्तु जाम्भोजी के अनुरोध पर उनकी आमदनी का पांचवां हिस्सा लेना स्वीकार किया –

‘सतगुरु कहे सांतिल करि चीत,

बिश्नोइयों सूं पाळो प्रीत | 

देव कहै राठोड़ौं सुणो,

बिश्नोई गुर –भाई गिणो |’

जाम्भोजी ने सोलंकी नेतसी को अजमेर के सूबेदार मल्लूखां से छुड़वाने के लिए कुछ ‘सबद’ कहे थे, जिसका उसके जीवन पर प्रभाव पड़ा था और उसने गौ-हत्या बंद करवा दी थी |

जैसलमेर के रावल जैतसी ने ‘जैत-समंद’ की प्रतिष्ठा पर जाम्भोजी को बुलाया था और उन्होंने जीव-दया सम्बिन्धित चार वचन उन्हें दिए थे | रावल जैतसी के अनुरोध पर लखमण और पांडू नाम के दो बिश्नोई उनकी रियासत के खरींगा ग्राम में बसे थे |

इस तरह उनके प्रभाव में तत्कालीन अनेक हस्तियाँ आई, जिनमें जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, द्रौणपुर-छापर, चित्तौड़ के शासकों के अलावा नागैर और अजमेर के सूबेदार और बादशाह सिकंदर लोदी तक के नाम लोकाख्यानों में मिलते हैं |

जाम्भोजी ने नाथों से संवाद किया था और उन्हें ‘अरथ-विहूणा’ वाद-विवाद से बचने का कहा था | पाखंड और सांसारिकता में सड़ते हिन्दुओं से कहा –

‘हिन्दु होय के हरि क्यूँ नीं जप्यौ,

काम दह दिस दिल पसरायौ |’ 

इसी तरह मुसलमानों को भी पाखंड और हिंसा से दूर रहने की सीख दी – 

चडि-चडि भीतै मडी मसीतै, क्या उळबंग पुकारौ |

भाई नांऊँ बळद पियारौ, तिहकै गळै करद क्यूँ सारौ||

नंगे-पाँव रहने वाले श्वेताम्बरी मुनियाँ को भी वे इसी तरह उलाहना देते कहते हैं – 

‘तेऊ पारि पहुन्ता नाहीं |

जाकि धोती रही आसमाणी ||’

कर्मवाद के पोषक और उदारता व मानववाद के समर्थक गुरु जाम्भोजी सत्य-अहिंसा के पुजारी थे | जाम्भोजी गुरु गोरख को महत्वपूर्ण मानते हुए कहते हैं कि गुरु गोरख निरंजन, अवधूत और महान है | गोरख अजर-अमर और ईश्वर सामान है | उनकी एक वाणी कहती है – ‘उसी गोरख ने मुझे कहा है कि – तुम सिद्ध हो, तुम सब वर्णों का समन्वय करके पवित्र धर्म की स्थापना करो |’ वस्तुतः जाम्भोजी एक क्रांतिकारी दर्शन के प्रणेता थे, जिसमें भारतीय सभी मतवादों के सत्य का सार था | 

जाम्भोजी का स्वर्गवास संवत 1593 की मार्गशीर्ष वदी नवमी को संभवतः समराथळ पर ही हुआ था | उनके काका पूल्होजी ने जब जाम्भोजी के देहत्याग का सुना तब उन्होंने भी ग्राम रिणसीसर में स्वेच्छा से देह त्याग दी | दोनों भतीजों के देहावसान का सुनकर जाम्भोजी की बुआ तांतू ने भी ननेऊ ग्राम में प्राण त्याग दिए | पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश के साथ ही अन्य राज्यों में भी जाम्भोजी के अनुयायी मिलते हैं |

Monday, 14 August 2017

दुआई गॉधी बापू ✋ 👋

भारतमाता ग्रामवासिनी!
खेतों मैं फैला है श्यामल ,
धूल भरा मैला-सा अॉचल!
दुआई गॉधी बापू,छिमा करो😊

मैं हूँ क्योंकि हम हैं!! 💕

उबुन्टु ( UBUNTU ) एक सुंदर कथा...!

उबुन्टु ऑपरेटिंग सिस्टम
( Ubuntu Operating System )

जानते हैं, किससे प्रेरित है इस ऑपरेटिंग सिस्टम का नाम ?
👇
कुछ आफ्रिकन आदीवासी बच्चों को एक मानवविज्ञानी ने एक खेल खेलने को कहा।

उसने एक टोकनी में मिठाइयाँ और कैंडीज एक वृक्ष के पास रख दिए।

बच्चों को वृक्ष से 100 मीटर दूर खड़े कर दिया।

फिर उसने कहा कि, जो बच्चा सबसे पहले पहुँचेगा उसे टोकनी के सारे स्वीट्स मिलेंगे।

जैसे ही उसने, रेड़ी स्टेडी गो कहा.....

तो जानते हैं उन छोटे बच्चों ने क्या किया ?

सभी ने एक दुसरे का हाँथ पकड़ा और एक साथ वृक्ष की ओर दौड़ गए, पास जाकर उन्होंने सारी मिठाइयाँ और कैंडीज आपस में बराबर बाँट लिए और मजे ले लेकर खाने लगे।

जब मानवविज्ञानी ने पूछा कि, उन लोगों ने ऐंसा क्यों किया ?
 
तो उन्होंने कहा---" उबुन्टु ( Ubuntu ) "

जिसका मतलब है,

" कोई एक व्यक्ति कैसे खुश रह सकता है जब, बाकी दूसरे सभी दुखी हों ? "

उबुन्टु ( Ubuntu ) का उनकी भाषा में मतलब है,

" मैं हूँ क्योंकि, हम हैं! "

सभी पीढ़ियों के लिए एक सुन्दर सन्देश,
आइए इस के साथ सब ओर जहाँ भी जाएँ, खुशियाँ बिखेरें,

आइए उबुन्टु ( Ubuntu ) वाली जिंदगी जिएँ.....

‌" मैं हूँ क्योंकि, हम हैं..!! "👍👍👍

Thursday, 6 April 2017

Motivational Story👏👏👏

प्रेरणाप्रद कहानी

 एक 6 वर्ष का बालक अपनी 4 वर्ष की बहन के साथ एक बाजार से गुजर रहा था। अचानक बालक ने पाया कि उसकी बहन पीछे ठहर गई है। बालक ठहरा और मुड़कर पीछे देखा। उसकी बहन खिलौने की एक दुकान के सामने खड़ी थी और बड़े ध्यान से कुछ देख रही थी। बालक वापस लौटा और अपनी बहन से पूछा, ‘‘ क्या तुम कुछ चाहती हो?’’ बहन ने एक गुड़िया की ओर संकेत किया। बालक ने उसका हाथ पकड़ा और एक जिम्मेदार बड़े भाई की तरह गुड़िया उसे दे दी। बहन बहुत ज्यादा खुश हो गई। दुकानदार यह सब देख रहा था और लड़के के परिपक्व व्यवहार के देखकर आनंदित हो रहा था... अब लड़के ने काउंटर पर जाकर दुकानदार से पूछा, “ इस गुड़िया की कीमत क्या है, श्रीमान!” दुकानदार एक धैर्यवान व्यक्ति था और जीवन की समस्याओं से परिचित था। इसलिए उसने बालक से बहुत प्यार और स्नेह से कहा, “ जो भी तुम दे सकते हो?” लड़के ने अपनी जेब से वे सभी कौड़ियां बाहर निकालीं जो उसने सागर तट से एकत्र की थीं और उनको दुकानदार को दे दिया। दुकानदार ने कौड़ियों को लिया और ऐसे गिनना शुरू किया, जैसे पैसे गिन रहा हो। तब उसने बच्चे की ओर देखा। बच्चे ने चिंता से पूछा, “क्या यह कम है?” दुकानदार ने कहा, “नहीं, नहीं..ये कीमत से अधिक हैं। इसलिए मैं बाकी वापस लौटाऊंगा।” ऐसा कहकर उसने केवल 4 कौड़ियां लीं और शेष वापस कर दी। बालक ने बहुत खुशी से बाकी कौड़ियां अपनी जेब में रखीं और बहन के साथ चला गया। उस दुकान में एक नौकर यह सब देखकर बहुत आश्चर्यचकित हुआ। उसने अपने मालिक से पूछा, “ श्रीमान! आपने वह महंगी गुड़िया केवल 4 कौड़ियों के बदले में दे दी।” दुकानदार ने मुस्कुरा कर कहा, “ हमारे लिए ये केवल मामूली कौड़ियां हैं लेकिन उस बालक के लिए ये कौड़ियां बहुत मूल्यवान हैं। इस उम्र में वह नहीं समझता कि पैसा क्या होता है लेकिन जब वह बड़ा होगा तो वह निश्चित ही समझेगा। जब वह याद करेगा कि उसने एक गुड़िया को पैसों की बजाय कौड़ियों से खरीदा था तब वह मुझे याद करेगा और सोचेगा कि यह दुनिया अच्छे लोगों से भरी है। यह उसे एक सकारात्मक मनोवृत्ति विकसित करने में मदद करेगा और वह भी इस तरह से अच्छा बनने के प्रेरित होगा। ” कहानी का मूलमंत्र- जो भी भावना आप दुनिया में डालते हो वह आगे फैलती है। यदि आप अच्छा करते हैं तो अच्छाई बढ़ेगी। यदि आप खराब करते हैं तो नकारात्मकता बढ़ेगी। इस बात को महसूस कीजिए कि आप ऊर्जा के एक बहुत शक्तिशाली स्रोत हैं। अच्छाई या बुराई कई गुना बढ़कर आपके पास लौटती है। उस तरीके से नहीं जैसा कि आप चाहते हैं और न उन तरीकों से जिनकों आप समझ सकते हैं। लेकिन वह वापस लौटेगी।

Friday, 3 February 2017

राधे-२

आज तक का सबसे सुदंर मैसेज .........ये पढने के बाद एक "आह" और एक "वाह" जरुर निकलेगी...

कृष्ण और राधा स्वर्ग में विचरण करते हुए
अचानक एक दुसरे के सामने आ गए

विचलित से कृष्ण-
प्रसन्नचित सी राधा...

कृष्ण सकपकाए,
राधा मुस्काई

इससे पहले कृष्ण कुछ कहते
राधा बोल💬 उठी-

"कैसे हो द्वारकाधीश ??"

जो राधा उन्हें कान्हा कान्हा कह के बुलाती थी
उसके मुख से द्वारकाधीश का संबोधन कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया

फिर भी किसी तरह अपने आप को संभाल लिया

और बोले राधा से ...

"मै तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ
तुम तो द्वारकाधीश मत कहो!

आओ बैठते है ....
कुछ मै अपनी कहता हूँ
कुछ तुम अपनी कहो

सच कहूँ राधा
जब जब भी तुम्हारी याद आती थी
इन आँखों से आँसुओं की बुँदे निकल आती थी..."

बोली राधा -
"मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ
ना तुम्हारी याद आई ना कोई आंसू बहा
क्यूंकि हम तुम्हे कभी भूले ही कहाँ थे जो तुम याद आते

इन आँखों में सदा तुम रहते थे
कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ
इसलिए रोते भी नहीं थे

प्रेम के अलग होने पर तुमने क्या खोया
इसका इक आइना दिखाऊं आपको ?

कुछ कडवे सच , प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ?

कभी सोचा इस तरक्की में तुम कितने पिछड़ गए
यमुना के मीठे पानी से जिंदगी शुरू की और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुच गए ?

एक ऊँगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्रपर भरोसा कर लिया
और
दसों उँगलियों पर चलने वाळी
बांसुरी को भूल गए ?

कान्हा जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो ....
जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी
प्रेम से अलग होने पर वही ऊँगली
क्या क्या रंग दिखाने लगी ?
सुदर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम आने लगी

कान्हा और द्वारकाधीश में
क्या फर्क होता है बताऊँ ?

कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते
सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता

युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता है
युद्ध में आप मिटाकर जीतते हैं
और प्रेम में आप मिटकर जीतते हैं

कान्हा प्रेम में डूबा हुआ आदमी
दुखी तो रह सकता है
पर किसी को दुःख नहीं देता

आप तो कई कलाओं के स्वामी हो
स्वप्न दूर द्रष्टा हो
गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो

पर आपने क्या निर्णय किया
अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी?
और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया ?

सेना तो आपकी प्रजा थी
राजा तो पालाक होता है
उसका रक्षक होता है

आप जैसा महा ज्ञानी
उस रथ को चला रहा था जिस पर बैठा अर्जुन
आपकी प्रजा को ही मार रहा था
आपनी प्रजा को मरते देख
आपमें करूणा नहीं जगी ?

क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे

आज भी धरती पर जाकर देखो

अपनी द्वारकाधीश वाळी छवि को
ढूंढते रह जाओगे
हर घर हर मंदिर में
मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे

आज भी मै मानती हूँ

लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं
उनके महत्व की बात करते है

मगर धरती के लोग
युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं, i.
प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं

गीता में मेरा दूर दूर तक नाम भी नहीं है,
पर आज भी लोग उसके समापन पर " राधे राधे" करते है". 🙏😊☺
Must Read Once
... जय श्रीकृष्णा 👏🌹🌷

उम्दा, मन मोहक,जबरदस्त-२:नि:शब्द

 अनुरोध बस इतना है कि इसे सुकून से महसूस कर पढ़ना।

     कहानी
#आधी #परी।              
(सच्ची घटना पर आधारित)

वो पचास वर्ष की हो गयी होगी लगभग।इतना प्यार और देखभाल उसे पहले कभी नहीं मिली थी।
आज उसे अच्छी सी टेबल पर भरपूर थाली ,फल ,सलाद और मिठाई के साथ दी गयी थी।
ललित पहली बार उसके लिए नया सलवार सूट लाया था, और एक गाउन भी।वर्ना कबसे तो वो बस उतरन ही पहनती आयी थी।बस पिता ही थे जो उसे गोदी उठाते,नई फ़्रॉक लाते और मिठाई खिलाते थे।
बड़ा अज़ीब था सबकुछ।वो आदी नहीं थी अच्छे व्यव्हार की।पिछले तीन दिनों से किसी ने भी उसे झिड़का और दुत्कारा नहीं था।

हाँ वो थोड़ी मंद बुद्धि थी।चीज़ों का बहुत विश्लेषण नहीं कर सकती थी।नयी चीज़ें याद करना भी मुश्किल था,बोलने में भी तुतलाती और अटकती थी।लेकिन बीते अच्छे और बुरे पल उसे याद होते थे हमेशा।शायद इन पलों को दिल सहेजता है दिमाग नहीं इसलिए।
और मस्तिष्क कमज़ोर था उसका दिल,भावनाएं,हंसी,खुशी,सम्मान,अपमान,प्यार,दुत्कार इन सबकी अनुभूति तो थी ही उसे।
उसे वैसे परिष्कृत हाव भाव नहीं आते थे जैसे सबके थे लेकिन वो समझ सकती थी औरों के हाव भाव और बातों के पीछे छिपे प्रेम ,घृणा  और दया को भी।

वो भरी थाली को देखती रही ,हर रोज़ की तरह ही उसे माँ की बातें अब भी याद आतीं।
सम्मान,प्यार,देखरेख  की अब उसे ज़रुरत नहीं थी।जब बरसों तक कोई चीज़ जिसके हम हक़दार  हों न मिले तो प्रकृति उससे विरक्ति पैदा कर देती है।
उसे अब वही विरक्ति थी।

इन्हीं विरक्त,शून्य को तलाशती आँखों में उसके बीते हुए पल घूम रहे थे।

पिता उसके लिए वही फ़्रॉक और मिठाई लाए थे।सब कहते थे वो छह वर्ष की ढोर है।
वो रंग पहचानना तो उस वक़्त तक भी नहीं सीखी थी लेकिन पिता का प्यार वो पहचानती थी।ये फ़्रॉक उसी प्यार से रंगी थी।
उसके कदम लड़खड़ाते थे,कुछ ही वाक्य लड़खाते बोलती थी।मुँह खुला और लार बहाते रखती थी।
वो अपनी सर्वश्रेष्ठ सामर्थ्य से दौड़ते लड़खड़ाते फ़्रॉक तक आयी थी।
ताली बजाई थी,खिलखिलाई थी।
तभी माँ ने फ़्रॉक को उठा कर दूर फेंक दिया था।

"कुलक्षिणी,बोदा, बड़ी फ़्रॉक पहनेगी।
लार बहाना तो बंद कर ले।
गधी से न तो बोलना आता न तमीज़।"

वो सहम गयी थी।
पापा ने उसके लिए लड़ाई भी की थी माँ से,और उसे गले से चिपका कर आंसू भी बहाये थे।माफ़ कर दो मुझे जैसा भी कुछ कहा था।

बड़े होते होते उसे अपनी कहानी पता चल ही गई थी कि आखिर वो ऐसी क्यों है।छोटे भाई ललित जैसी सुन्दर,दौड़ सकने,साइकिल चला सकने,अच्छे से बोल सकने और पढ़ाई कर सकने लायक क्यों नहीं।
उसकी कहानी उसे इसलिए पता चली थी क्योंकि जो भी घर में आता उसे देखते ही पहला प्रश्न ये पूछता, "क्या हुआ था इसे?'
"क्या ये मंदबुद्धि है?"
"एक तो लड़की जात ऊपर से ऐसी।क्या होगा च् च् च्......."
उनकी सहानुभूति अवचेतन में छुपी खुशी सी होती, मानो दिल कहना चाह रहा हो चलो हम और हमारे बच्चे बच गए प्रकृति के इस प्रकोप से।
पिछले जन्म के पाप के विषय में भी चर्चाएं शुरू हो जातीं।

और जवाब में माँ विस्तार से हर बार बताती।

"इसकी महतारी तो मर गई जनम के समय लेकिन हमारे सर पर इसे पटक गयी।
बोलते हैं  देर से रोई थी तो दिमाग को ऑक्सीजन कम
हो गया।उससे ऐसी पगला गयी।"

उसके देर से रोने की सज़ा जीवनभर के आंसू होने वाले थे।
कितनी ही बार माँ कहती "काहे जनम लिया तूने।अपनी माँ के साथ तब ही नहीं मर सकती थी।
आखिर ऐसी ज़िंदगी का मतलब ही क्या।क्यों लेते है जन्म ऐसे बच्चे।"

हाँ उसकी माँ की मृत्यु के एक वर्ष बाद ही पापा ,माँ को ले आये थे।
आखिर लाये वो उन्हें उसके लिए ही थे।आखिर कैसे पालते।
अकेली माएं तो बच्चे पाल लेती हैं लेकिन अकेले पिता नहीं।प्रकृति ने बड़ा कमज़ोर बनाया है इस मामले में पुरुष को।

माँ एक साल तक तो ठीक रही ,लेकिन उसके तीन बर्ष के होते होते ललित आ गया था उनकी गोद में।
अब दो बच्चों को पालना उसपर भी एक बच्ची ऐसी।
मंदबुद्धि।अब भी बिस्तर पर सबकुछ करने वाली।
कटोरी में खाना दो तो पूरे फर्श में फैला देने वाली।
और माँ बदलने लगी।
वो जितना ललित को प्यार करती उतना ही उसे दुत्कारती।
माँ को लगता वो अड़ंगा है ललित की परवरिश में।

लेकिन उसे तो ललित बड़ा प्यारा लगता।
उसका पहला खिलौना। मोटा सा ,गोरा गोरा।
जब वो लड़खड़ा कर चलती तब ललित घुटने के बल चलता।
वो उसकी तरफ बॉल लुढ़काता तो वो खिलखिलाती।

धीरे धीरे दोनों बड़े होने लगे। ललित धीमे और वो बहुत धीमे...।
ललित प्यार से पल रहा था और वो दुत्कार से।
ललित हालाँकि उसे दीदी ही बोलता। प्यार करता, रक्षा करता।उसका खिलौना बड़ा हो गया था और वो छोटी ही रह गयी थी।ललित अब स्कूल और बाहर दोस्तों के साथ ज़्यादा खेलता। वो पुराने हो चुके खिलौने सी बैठी रहती घर में।
पापा ने उसका दिमाग बढ़ाने एक पज़ल सा खिलौना  ला कर दिया था।  आधा टुकड़ा ललित को और आधा उसे दिया था।दोनों को मिलाने पर एक परी बन जाती थी।
वो उसे शुरू में बहुत मुश्किल से जोड़ पाती थी,ललित तुरंत।लेकिन धीरे धीरे वो भी सीख गयी थी आसानी से जोड़ना।उस पज़ल से दिमाग बढ़ा था कि नहीं ये तो नहीं पता लेकिन उसे खुद वो ललित के बिना अधूरी लगने लगी थी।ललित का आधा टुकड़ा ही उसे सम्पूर्ण करता।
लेकिन एक दिन ललित ने आधी पज़ल गुमा दी थी।
वो गुमसुम हो गयी थी।जैसे टूट गयी हो खुद।आधी परी।

स्कूल भेजने की कोशिश की गयी थी उसे भी।लेकिन वो एक अलग दुनिया थी उसके लिए।दो दिन भी नहीं रह पाई थी वहां।
हाँ ललित ने ही नाम लिखना सिखा दिया था।वो दिन भर अपना नाम लिखती रहती।
ललित से उसने एक बार पूछा था लडख़ड़ाती ज़बान से
"भाई मंदबुद्धि कैसे लिखते हैं।"

ललित का जन्मदिन मनाया जाता,उसे संगीत पसंद था,अपने कमरे में थिरकती ताली बजा बजा कर,लेकिन जन्मदिन में शामिल होने की अनुमति नहीं थी उसे।माँ को उसे चिढ़ाये जाने और शर्म का अहसास होता।

उसके सुकून के पल पापा के आने पर होते।जब पापा दोनों को गोदी उठाते।
ललित उसे कितना प्यार करता है उसने तब जाना था जब वो एकबार बाहर आ गई थी , वो क्रिकेट खेल रहा था।
और एक बच्चे ने कह दिया था  "तेरी बहन पागल है।"

और ललित भिड़ गया था उससे।
अपने से बड़े लड़के से।
उसे खरोंचें आयी थीं और माँ से दोनों को बहुत डांट पड़ी थी।
मुझे कहीं ज़्यादा।
माँ ने कहा था "पगलिया को पागल नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे लोग।बुचड़ी क्यों गयी थी बाहर नाक कटाने।
और मेरा बाहर निकलना बिलकुल बंद करवा दिया था।"

और ऐसे ही उसका  बचपन बीता था।
उसकी जवानी न तो आईनों, कपड़ों मेकअप के साथ थी न कॉलेज, कैंटीन ,फिल्मों में।
क्या पता उसे लड़के पसंद आते थे भी या नहीं।क्या प्रेम की आकांक्षा इन्हें भी होती होगी?होती भी हो तो क्या,प्यार पाने के अधिकार तो ये बच्चे तब ही खो चुके होते हैं जब ये जी जाते हैं, मरते मरते।
जवानी में उसपर सबके सामने आने  पर पूरे पहरे लगा दिए गए थे।
ललित की शादी के समय उसने सजी ,धजी खूबसूरत दुल्हन देखी थी,सब कित्ती सुन्दर है,कित्ती प्यारी है बोल रहे थे।
और तब ही वो खुद भी गाढ़ी फ़ैली हुई लिपस्टिक पोत आई थी सबके सामने।

सब उसे देख कर खूब हंसे थे।
वो रुक कर पहले उन्हें हँसते देख रही थी।उसका छोटा सा दिमाग इस हंसी के पीछे के मतलब को प्रोसेस कर रहा था।उसे लगा था लिपस्टिक के बाद उसे भी कहा जायेगा कित्ती सुन्दर लग रही है,लेकिन सब हंसे थे।
जब छोटे दिमाग ने प्रोसेस कर लिया तो वो भी हंसी थी थोड़ा शर्माकर।

ललित की दुल्हन अच्छी थी ।कहीं जॉब करती थी।
अच्छी लेकिन बहुत व्यस्त।उससे वो घृणा वाले शब्द उसने कभी नहीं कहे थे।लेकिन सच तो ये है कि उसने कभी कुछ कहा ही नहीं था।वो कौने में रखा स्टूल थी उसके लिए।धुल लगा स्टूल जिसे छूने से हाथ गंदे हो जाते।
ललित भी व्यस्त होते चला गया।
अब उससे दुर्व्यवहार तो कोई नहीं करता था।माँ भी नहीं लेकिन उपेक्षा खुद भी तो सजा ही होती है।
अकेली कौने में बैठी, खिड़की से देखती रहती बाहर बच्चों को खेलते हुए।।
बचपन में सहानुभूति दिखाने वाली आवाज़ें भी धीरे धीरे ख़त्म हो गयी थीं।

और यूँ ही जवानी भी कट  गयी थी।
सच तो पूछती थी माँ आखिर तू क्यों बच गयी।तू क्यों न मर गयी।

उद्देश्यहीन ,अनुपयोगी जीवन।बस खाना, जागना और सोना यह चक्र चलते पचास वर्ष हो गए थे और आज अचानक उसे सम्मान और अच्छा खाना मिला था।

माँ ने अब कोसना न के बराबर कर दिया था,काफी बूढ़ी और कमज़ोर जो हो गयी थीं।
पिता जब नहीं रहे ,वो रोई नहीं थी।क्योंकि उसका वही छोटा सा दिमाग, प्रोसेस नहीं कर पाया था मौत और उसके मतलब को।
बहुत दिनों तक अब भी वो पहले की ही तरह उनकी आवाज़ की प्रतीक्षा करती रोज़ शाम।

थोड़ा सा खाना ख़त्म कर वो बैठी ही थी कि माँ पास आयी।बूढ़ी ,लेकिन अब भी दिमाग वैसा ही तेज़।
पहली बार शायद नाम लिया था माँ ने ,वरना उसका तो नाम ही मंदबुद्धि रख दिया था माँ ने।

पिछले एक हफ्ते से फ़ैली अज़ीब मनहूसियत और उस पर उसकी ये देखभाल।पुराने खिलौने को जैसे किसी ने झाड़ पोंछ कर फिर से सजा दिया था उजड़े मकान में।
उसकी इस देख रेख के पीछे कहीं, कुछ छुपा था।वो अहसास कर सकती थी। बेचैनी,असमंजस कशमकश जैसे शब्द उसे कहाँ पता थे ,लेकिन ये थे तो उसी की भीतर।और इस घर की दीवारों के भीतर।
सबके बुझे चेहरे, ऊपरी मुस्कराहट तले ढंके थे।

आखिर अब उसे समझ आने ही वाला था।
माँ  सर पर हाथ रख बोली थी  "बेटा मैं जीवन भर तुझे कहती रही तू क्यों जी गयी।क्यों मर न गयी।"

आज समझ आया मुझसे कितना बड़ा पाप हुआ है।

चल डॉक्टर के पास।

ललित ,बहू और माँ तीनों उसे लेकर डॉक्टर के पास गए थे।

डॉक्टर कौशल एक जाने माने कैंसर रोग विशेषज्ञ थे।
उन्होंने मुस्कुरा कर कहा "अच्छा! ले आये आप इन्हें।
ये बहन हैं आपकी?"

"ठीक है फिर हम कोशिश कर सकते हैं।"

माँ ने पुछा था "डॉक्टर ललित ठीक तो हो जायेगा न।
और हमें भी थोडा सा समझा दें ये क्या बीमारी है।"

डॉक्टर ने कहा था

"माँ जी क्रोनिक माइलॉयड ल्युकेमिया नाम का ब्लड कैंसर है ललित को।
ये धीमे धीमे आगे बढ़ने वाला कैंसर है।
बोन मेरो ट्रांसप्लांटेशन ही एक मात्र परमानेंट उपचार है।
हालाँकि बोन मेरो ट्रांसप्लांट में दिक्कत ये है कि ये मैच होना चाहिए साथ ही कुछ खतरा भी होता है।
बोन मेरो मैच होने की सम्भावना भाई बहन में ज़्यादा होती है।और ललित के केस में तो और किसी से लिया ही नहीं जा सकता क्योंकि आप की उम्र ज़्यादा है और आनुवंशिक रूप से कोई और करीबी संबंधी नहीं है।
ललित ने बताया था एक ही बहन है,तो मैंने कहा कोशिश कर लेते हैं।"

"लेकिन हाँ डोनर की सहमति आवश्यक है मिलान के पहले।"

और उससे डॉक्टर ने कहा था "बोनमेरो की जांच में थोड़ा दर्द होगा आपको ,क्या आप करवाओगी?"

उसके उसी छोटे से दिमाग ने बस इतना प्रोसेस किया था इस बार कि इन्हें ललित के लिए मुझसे कुछ चाहिए ,कुछ ऐसा कि मुझे दर्द होगा।

वो उत्तर में बस हंसी थी।
दो दिन बाद बोनमेरो मैच हो गया था
अस्पताल के सहमति पत्र में उसने वही उबड़ खाबड़ हस्ताक्षर कर दिए थे जो ललित ने सिखाये थे।उसे ललित से तब ही बहुत प्यार हो गया था जब उसे खरोंचें लगीं थी लड़ाई में।वो आधी परी को छुपाये हुए थी बायीं मुट्ठी में।आधी परी का बोनमैरो ललित में मिलकर उसे पूरा बना रहा था।

वो क्यों मर न गयी तब ही ये उसको और माँ को समझ आ गया था।

।।अव्यक्त।।

Don't Underestimate yourself

Once upon a time, a clever monkey lived in a tree that bore juicy, red rose apples. He was very happy. One fine day, a crocodile swam up to that tree and told the monkey that he had traveled a long distance and was in search of food as he was very hungry. The kind monkey offered him a few rose apples. The crocodile enjoyed them very much and asked the monkey whether he could come again for some more fruit. The generous monkey happily agreed.

The crocodile returned the next day. And the next. And the next one after that. Soon the two became very good friends. They discussed their lives, their friends and family, like all friends do. The crocodile told the monkey that he had a wife and that they lived on the other side of the river. So the kind monkey offered him some extra rose apples to take home to his wife. The crocodile’s wife loved the rose apples and made her husband promise to get her some every day.

Meanwhile, the friendship between the monkey and the crocodile deepened as they spent more and more time together. The crocodile’s wife started getting jealous. She wanted to put an end to this friendship. So she pretended that she could not believe that her husband could be friends with a monkey. Her husband tried to convince her that he and the monkey shared a true friendship. The crocodile’s wife thought to herself that if the monkey lived on a diet of rose monkeys, his flesh would be very sweet. So she asked the crocodile to invite the monkey to their house.

The crocodile was not happy about this. He tried to make the excuse that it would be difficult to get the monkey across the river. But his wife was determined to eat the monkey’s flesh. So she thought of a plan. One day, she pretended to be very ill and told the crocodile that the doctor said that she would only recover if she ate a monkey’s heart. If her husband wanted to save her life, he must bring her his friend’s heart.

The crocodile was aghast. He was in a dilemma. On the one hand, he loved his friend. On the other, he could not possibly let his wife die. The crocodile’s wife threatened him saying that if he did not get her the monkey’s heart, she would surely die.

So the crocodile went to the rose apple tree and invited the monkey to come home to meet his wife. He told the monkey that he could ride across the river on the crocodile’s back. The monkey happily agreed. As they reached the middle of the river, the crocodile began to sink. The frightened monkey asked him why he was doing that. The crocodile explained that he would have to kill the monkey to save his wife’s life. The clever monkey told him that he would gladly give up his heart to save the life of the crocodile’s wife, but he had left his heart behind in the rose apple tree. He asked the crocodile to make haste and turn back so that the monkey could go get his heart from the apple tree.

The silly crocodile quickly swam back to the rose apple tree. The monkey scampered up the tree to safety. He told the crocodile to tell his wicked wife that she had married the biggest fool in the world.

‌Moral: Don’t underestimate yourself. There are bigger fools in this world.☺😀😃

मार्मिक संदेश, जरूर पढें ☝✋👏👏

Please read this


ऑफिस से निकल कर शर्माजी ने

स्कूटर स्टार्ट किया ही था कि उन्हें याद आया,
.
पत्नी ने कहा था 1 दर्ज़न केले लेते आना।
.
तभी उन्हें सड़क किनारे बड़े और ताज़ा केले बेचते हुए

एक बीमार सी दिखने वाली बुढ़िया दिख गयी।
.
वैसे तो वह फल हमेशा "राम आसरे फ्रूट भण्डार" से

ही लेते थे,
पर आज उन्हें लगा कि क्यों न

बुढ़िया से ही खरीद लूँ ?
.
उन्होंने बुढ़िया से पूछा, "माई, केले कैसे दिए"
.
बुढ़िया बोली, बाबूजी 20 रूपये दर्जन,

शर्माजी बोले, माई 15 रूपये दूंगा।
.
बुढ़िया ने कहा, 18 रूपये दे देना,

दो पैसे मै भी कमा लूंगी।
.
शर्मा जी बोले, 15 रूपये लेने हैं तो बोल,

बुझे चेहरे से बुढ़िया ने,"न" मे गर्दन हिला दी।
.
शर्माजी बिना कुछ कहे चल पड़े

और राम आसरे फ्रूट भण्डार पर आकर

केले का भाव पूछा तो वह बोला 28 रूपये दर्जन हैं
.
बाबूजी, कितने दर्जन दूँ ?

शर्माजी बोले, 5 साल से फल तुमसे ही ले रहा हूँ,

ठीक भाव लगाओ।
.
तो उसने सामने लगे बोर्ड की ओर इशारा कर दिया।

बोर्ड पर लिखा था- "मोल भाव करने वाले माफ़ करें"

शर्माजी को उसका यह व्यवहार बहुत बुरा लगा,

उन्होंने कुछ  सोचकर स्कूटर को वापस

ऑफिस की ओर मोड़ दिया।
.
सोचते सोचते वह बुढ़िया के पास पहुँच गए।

बुढ़िया ने उन्हें पहचान लिया और बोली,
.
"बाबूजी केले दे दूँ, पर भाव 18 रूपये से कम नही लगाउंगी।

शर्माजी ने मुस्कराकर कहा,

माई एक  नही दो दर्जन दे दो और भाव की चिंता मत करो।
.
बुढ़िया का चेहरा ख़ुशी से दमकने लगा।

केले देते हुए बोली। बाबूजी मेरे पास थैली नही है ।

फिर बोली, एक टाइम था जब मेरा आदमी जिन्दा था
.
तो मेरी भी छोटी सी दुकान थी।

सब्ज़ी, फल सब बिकता था उस पर।

आदमी की बीमारी मे दुकान चली गयी,

आदमी भी नही रहा। अब खाने के भी लाले पड़े हैं।

किसी तरह पेट पाल रही हूँ। कोई औलाद भी नही है
.
जिसकी ओर मदद के लिए देखूं।

इतना कहते कहते बुढ़िया रुआंसी हो गयी,

और उसकी आंखों मे आंसू आ गए ।
.
शर्माजी ने 50 रूपये का नोट बुढ़िया को दिया तो

वो बोली "बाबूजी मेरे पास छुट्टे नही हैं।
.
शर्माजी बोले "माई चिंता मत करो, रख लो,

अब मै तुमसे ही फल खरीदूंगा,
और कल मै तुम्हें 500 रूपये दूंगा।

धीरे धीरे चुका देना और परसों से बेचने के लिए

मंडी से दूसरे फल भी ले आना।
.
बुढ़िया कुछ कह पाती उसके पहले ही

शर्माजी घर की ओर रवाना हो गए।

घर पहुंचकर उन्होंने पत्नी से कहा,

न जाने क्यों हम हमेशा मुश्किल से

पेट पालने वाले, थड़ी लगा कर सामान बेचने वालों से

मोल भाव करते हैं किन्तु बड़ी दुकानों पर

मुंह मांगे पैसे दे आते हैं।
.
शायद हमारी मानसिकता ही बिगड़ गयी है।

गुणवत्ता के स्थान पर हम चकाचौंध पर

अधिक ध्यान देने लगे हैं।
.
अगले दिन शर्माजी ने बुढ़िया को 500 रूपये देते हुए कहा,

"माई लौटाने की चिंता मत करना।

जो फल खरीदूंगा, उनकी कीमत से ही चुक जाएंगे।

जब शर्माजी ने ऑफिस मे ये किस्सा बताया तो

सबने बुढ़िया से ही फल खरीदना प्रारम्भ कर दिया।

तीन महीने बाद ऑफिस के लोगों ने स्टाफ क्लब की ओर से

बुढ़िया को एक हाथ ठेला भेंट कर दिया।

बुढ़िया अब बहुत खुश है।

उचित खान पान के कारण उसका स्वास्थ्य भी

पहले से बहुत अच्छा है ।

हर दिन शर्माजी और ऑफिस के

दूसरे लोगों को दुआ देती नही थकती।
.
शर्माजी के मन में भी अपनी बदली सोच और

एक असहाय निर्बल महिला की सहायता करने की संतुष्टि का भाव रहता है..!

जीवन मे किसी बेसहारा की मदद करके देखो यारों,

अपनी पूरी जिंदगी मे किये गए सभी कार्यों से

ज्यादा संतोष मिलेगा...!!
😊😊


Bishnoism: Tree Hugger

The Bishnois
The Bishnois, a Vaishnavite sect, living in western Rajasthan on the fringe of the Thar desert, have for centuries, been conserving the flora and fauna to the extent of sacrificing their lives to protect the environment. For these nature-loving people, protection of the environment, wildlife, and plants is a part and parcel of their sacred traditions. The basic philosophy of this religion is that all living things have a right to survive and share all resources.In the fifteenth century, Jambhoji, a resident of a village near Jodhpur, had a vision that the cause of the drought that had hit the area and hardship that followed was caused by people’s interference with nature. Thereafter, he became a sanyasi or a holy man and came to be known as Swami Jambeshwar Maharaj. This was the beginning of the Bishnoi sect. He laid down 29 tenets for his followers which included a ban on killing animals, a ban to the felling of trees – especially the khejri – which grows extensively in these areas, and using material other than wood for cremations. Nature protection was given foremost importance in these tenets. Since then, the sect has religiously followed these tenets.There are many stories about how the Bishnois have beaten up hunters and poachers for intruding in their area. The sacrifice made by Amrita Devi and over 363 others is a heart-rending example of their devotion. The Maharaja of Jodhpur wanted to build a new palace and required wood for it. To procure this his men went to the area around the village of Jalnadi to fell the trees. When Amrita Devi saw this she rushed out to prevent the men and hugged the first tree, but the axe fell on her and she died on the spot. Before dying she uttered the now famous couplet of the Bishnois, ‘A chopped head is cheaper than a felled tree’. People from 83 surrounding villages rushed to prevent the men from felling the trees and by the end of the day more than 363 had lost their lives.When the king heard about this, he was filled with remorse and came to the village to personally apologize to the people. He promised them that they would never again be asked to provide timber to the ruler, no khejri tree would ever be cut, and hunting would be banned near the Bishnoi villages. The village of Jalnadi thus came to be called Khejarli.The Bishnois will go to any extent to protect the wildlife and the forests around them.Recently this sect was in the news due to the activities of some Mumbai film group that had gone on a hunting spree in their area targeting the black buck. The Bishnois, in keeping to their tradition, prevented them from doing so and lodged a complaint against two of them in the local police station.The heartland of the Bishnois in the forests near Jodhpur is abundant in trees and wildlife. The landscape around here is greener than elsewhere and the animals mainly antelopes, particularly the blackbuck and the chinkara, in these forests are not afraid of humans and are often seen near the villages eating out of the villagers’ hands. The Bishnois have indeed proved that human lives are a small price to pay to protect the wildlife and the forests around them.Though they are staunch Hindus they often do not cremate their dead but bury them, as they are not permitted to use wood for the cremation.There is a saying that goes "Sir santhe rooke rahe to bhi sasto jaan" this means that if a tree is saved from felling at the cost of one’s head, it should be considered as a good deed. It is for this environmental awareness and commitment that the Bishnois stand apart from other sects and communities in India.

Monday, 3 October 2016

Hanuman Chalisa in Hindi and English Version

First time Hanuman Chalisa translated in english....aap sab padhe aur anandit ho!!🙏🏼🙏🏼🙏🏼

श्रीगुरु चरन सरोज रज
In the Lotus feet of my teacher/Guardian

निज मन मुकुर सुधारि।
I purify the mirror of my heart

बरनउँ रघुबर बिमल जसु
I illustrate the story of immaculate Rama

जो दायकु फल चारि॥
which bestows four fruits (The 4 Purusharth : desire, prosperity, righteousness, liberation)

बुद्धिहीन तनु जानिकै
Considering myself as frail & unwise

सुमिरौं पवनकुमार।
I contemplate Son of Wind ( Hanuman)

बल बुद्धिविद्या देहु मोहिं
to impart power, knowledge & civilization

हरहु कलेश विकार ॥
& to eradicate all the miseries of life.

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
I glorify lord Hanuman, the deep sea of knowledge & virtues

जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
I glorify The Monkey man “Vanara” ,who lightens the three worlds (earth, atmosphere & beyond)

राम दूत अतुलित बल धामा।
I glorify the faithful envoy of lord Ram,

अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥
who is also known as son of anjana (anjaniputra) & wind’s son (pavansuta)

महाबीर बिक्रम बजरंगी।
You are the distinguished warrior, the courageous & possess strength as “Indra’s vajra”

कुमति निवार सुमति के संगी॥
You demolish despicable mind and befriend fine intellect

कंचन बरन बिराज सुबेसा।
being gold complexioned he dwells in his handsome form

कानन कुंडल कुंचित केसा॥
You adorn earrings & curly hair.

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। You hold “Vajra” in one hand & flag in the other

काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
You adorn the sacred thread “Janeu” prepared by “Munja grass” on your shoulder

शंकर सुवन केसरी नंदन।
You are the delight of Shiva, the son of Kesari

तेज प्रताप महा जग बंदन॥
You possess a majestic aura & are admired by the whole world

बिद्यावान गुनी अति चातुर।
You are the laudable abode of the eighteen types of Vidya

राम काज करिबे को आतुर॥
You are always willing to serve lord Rama

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
You adore listening Lord Rama’s legends

राम लखन सीता मन बसिया॥
You reside in the heart of Rama, his wife Sita & his younger brother Lakshman.

सूक्ष्म रूप धरी सियहिं दिखावा।
You searched Sita by adorning the miniscule form

बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
And you set gold made Lanka ablaze by appearing in an outsized form

भीम रूप धरि असुर सँहारे।
You destroyed all the demons by taking horrendous form

रामचन्द्र के काज सँवारे॥
And that is how you performed all the deeds of Sri Rama.

लाय सँजीवनि लखन जियाए।
You carried the Dronagiri Mountain from Himalayas which contained Sanjeevani to Lanka and saved Lakshman.

श्रीरघुबीर हरषि उर लाए॥
Elated by this act Sri Rama embraced you.

रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई।
Rama applauded many times.

तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
Rama even said that you are dear to him just like his brother Bharat.

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
Thousands of people will pay tribute to you

अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
Saying this Rama again embraces you

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
Many saints like Bhramha & Munisha

नारद सारद सहित अहीसा॥
Narad & Sarad have blessed Hanuman.

जम कुबेर दिक्पाल जहाँ ते।
Yama Kuber & Dikpal

कबी कोबिद कहि सकैं कहाँ ते॥
Kavi & Kovid, none could elucidate Hanuman’s glory.

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
You were extreme benevolent to Sugreev

राम मिलाय राजपद दीन्हा॥
Befriended him with Rama & acquired him his Kingdom Kishkindha

तुम्हरो मन्त्र बिभीषन माना।
Even Vibhishan endorsed your mantra, as a result, became king of Lanka

लंकेश्वर भए सब जग जाना॥
Ravan, former king of Lanka, was scared of you.

जुग सहस्र जोजन पर भानू।
Sun, which is at thousands of distance from Earth

लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
You swallowed it believing it to be a syrupy fruit.

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
Placing the ring in your mouth

जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
Its not astounding that you leaped the ocean

दुर्गम काज जगत के जेते ।
The obscure tasks of the world

सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
were achieved by your grace

राम दुआरे तुम रखवारे।
You are the concierge & guardian of Rama’s court

होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
No one can enter in his court without your consent

सब सुख लहै तुम्हारी शरना।
All pleasures are attained by your refugee

तुम रक्षक काहू को डर ना॥
No fear can abode the one whom you protect

आपन तेज सम्हारो आपै ।
Once you commemorate your powers

तीनौं लोक हाँक ते काँपे॥
all three world’s start trembling with fear

भूत पिशाच निकट नहिं आवै।
Evil spirits can not disturb

महाबीर जब नाम सुनावै॥
when one sings your hymns & remembers you.

नासै रोग हरै सब पीरा।
you destroy all the ailments & take away all the pessimism

जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
of those who regular remember you.

सब पर राम तपस्वी राजा।
Though Rama is the Supreme Being

तिन के काज सकल तुम साजा॥
you accomplish all his tasks.

और मनोरथ जो कोई लावै।
If anyone ever desires for something

तासु अमित जीवन फल पावै॥
You fulfill his desires manifolds

साधु संत के तुम रखवारे।
You are Saints & the one who meditates protector

असुर निकंदन राम दुलारे॥
You slay demons & are dear to Rama

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
You possess eight supernatural powers & nine treasures

अस बर दीन्ह जानकी माता॥
and this has been granted to you by Rama’s wife Sita.

तुम्हरे भजन राम को पावै।
Whoever sings your hymns directly possess the Supreme Being, Rama

जनम जनम के दुख बिसरावै॥
and gets rid of all the adversities & negativities of life.

अंत काल रघुबर पुर जाई।
The one who is y our devotee, goes to the Supreme being’s abode after his body death

जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥
And when they are reborn after that, they are always known as God’s devotees

और देवता चित्त न धरई।
Anyone who does not prayer to any other God

हनुमत सेइ सर्व सुख करई॥
but only to you, even he attains all the treasures of life ( generally it is said that every god imparts something or the other)

संकट कटै मिटै सब पीरा।
All the ailments vanish & one is relieved from all the adversities

जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
once when someone becomes your devotee & remembers you.

जय जय जय हनुमान गोसाईं।
I praise the victorious , the master of all senses, Hanuman

कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
just like guru showers his blessings on his disciple, shower me with your blessings

जो शत बार पाठ कर कोई।
The one who recites this hymn 100 times

छूटहि बंदि महा सुख होई॥
All his troubles vanish & he gains all the life’s treasures.

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
Who ever recites this Chalisa

होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
obtains all the powers & lord Shiva is the witness of this.

तुलसीदास सदा हरि चेरा।
Tulsidas, who is the writer of this Chalisa, will always remain you disciple

कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
and he prays to the lord enshrine in his soul always.

पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप।
I call upon son of wind, an auspicious form to remove all miseries of my life

राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप॥
I pray to you to reside in my heart with Rama, Sita & Lakshman.

"RAM"
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Wednesday, 11 March 2015

What is commitment?

Regardless of the uncertainty, commitment says "You can count on me." A person who makes a commitment is willing to give up a lot. For what? The answer is pretty clear. The rewards can be priceless.
Commitment says:
1. I am willing to sacrifice because I care.
2. I am a person of integrity and you can trust me.
3. I will not let you down.
4. Despite pain, I will still be there.
5. I will not let you down in good times or in bad times.
Commitment is not like a legal contract which is enforceable. Its foundation is not a signed piece of paper but character, integrity, and empathy.

Commitment does not mean sticking to something when a person has no choice. It means sticking in spite of choices. Without the above ingredients, no one would make a serious long-lasting commitment to others.




COMMITMENT TO VALUES
Loyalties cannot be bought, they are earned. And to whom do we owe loyalties? Is it individuals or organizations? The answer is none of them. We owe loyalties to values. Where the value system is conflicting, people cannot live in the same home, they cannot work in the same organization.
When a person makes a commitment of loyalty to either an individual or an organization, what is he really saying? He is saying, "I stand by you because I believe in what you believe in."
What if the person I am committed to, be it a leader, spouse, employer, employee becomes a spy for an enemy country? Do I continue my support because I committed earlier? Absolutely not. I am not committed to support unethical and illegal behavior.
Unkept commitments lead to:
♦♦♦♦♦♦♦♦♦
Broken homes
Abandoned children
Poor relationships
High stress levels
Guilt
Unfulfilled life
Loss of business
Isolation
Depression
Make a commitment and stay committed!

Monday, 19 May 2014

WINNERS VERSUS LOSERS by:RK BISHNOI

WINNERS VERSUS LOSERS 
♦♦♦♦♦♦
The Winner is always part of the answer;
The Loser is always part of the problem.
The Winner always has a program;
The Loser always has an excuse.
The Winner says, "Let me do it for you";
The Loser says, "That is not my job."
The Winner sees an answer for every problem;
The Loser sees a problem for every answer.
The Winner says, "It may be difficult but it is possible";
The Loser says, "It may be possible but it is too difficult."
When a Winner makes a mistake, he says, "I was wrong";

When a Loser makes a mistake, he says, "It wasn't my fault."
♦♦♦♦♦♦♦♦♦♦♦♦
A Winner makes commitments;
A Loser makes promises.
Winners have dreams;
Losers have schemes.
Winners say, "I must do something";
Losers say, "Something must be done."
Winners are a part of the team;
Losers are apart from the team.
Winners see the gain;
Losers see the pain.
Winners see possibilities;
Losers see problems.
Winners believe in win-win;
Losers believe for them to win someone has to lose.
Winners see the potential;
Losers see the past.
Winners are like a thermostat;
Losers are like thermometers.
Winners choose what they say;
Losers say what they choose.
Winners use hard arguments but soft words;
Losers use soft arguments but hard words.
Winners stand firm on values but compromise on petty things;
Losers stand firm on petty things but compromise on values.

♦♦♦
Winners follow the philosophy of empathy: "Don't do to others what you would not want them to do to you";
Losers follow the philosophy, "Do it to others before they do it to you."
Winners make it happen;
Losers let it happen.
Winners plan and prepare to win.
The key word is preparation.

BE A WINNER--ACTION STEPS
Let me close this chapter with the eight action steps discussed earlier:
1. Be a good finder.
2. Make a habit of doing it now.
3. Develop an attitude of gratitude.
4. Get into a continuous education program.
5. Build positive self-esteem.
6. Stay away from negative influences.
7. Learn to like the things that need to be done.
8. Start your day with a positive. 

Common Sence & Knowledge by:RK BISHNOI

Common sense :Education and knowledge without common sense has little meaning. Common sense is the ability to see things as they are and do them as they ought to be done. We are born with five senses touch, taste, sight, smell, and hearing. But successful people have a sixth sense common sense. Common sense is gained in spite of, not necessarily as a result of, education. The best education without common sense is worthless. An abundance of common sense is called wisdom.

Knowledge is Power
We hear every day that knowledge is power. Not really. Knowledge is information. It is potential power and it becomes power only when it is acted upon.
What is the difference between a person who cannot read and a person who can but does not read? Not a whole lot.
Learning is like eating food. It is not how much you eat that matters, what counts is how much you digest.
Knowledge is potential power, wisdom is real power.
Education takes many forms, it is not just grades and a degree. It is
♦♦♦♦
  • cultivating your strength
  • learning self-discipline
  • listening
  • desiring to learn
  • Our minds, like muscles, stretch or shrink depending on how much or how little we exercise them.

If you think education is expensive, try ignorance.
--Derek Bok
Continuous positive education leads to positive thinking.

Sunday, 16 March 2014

The festival of Holi in context of the Bishnoi community by:RK BISHNOI

"Navan Pranam Dosto!I wish  u & ur Family a very Happy 

Holi ....its brings joy,hues of ur bright future "

The ancient Indian festival Holi is of very high significance for Bishnoism as the Bishnois consider themselves as the descendents of the Bhakt Prahlad, the son of demon king Hiranykashyap. It is said that Prahlad refused to accept his father as God and insisted that Lord Vishnu was the only God and only He and none other was worthy of worship, which remains a central theme of even the present day Bishnoism. In the Bishnoi scripture 'Sabadvani' (considered to be the fifth Veda by the believers) it has been said that Lord Vishnu reincarnated Himself as 'Narsimha' (Human+Lion) to rescue Prahalad from his demon father and Guru Jambheshwar came to this world to keep His promise made to Prahlad, of the liberation of 12 crore souls in the Kaliyuga(by jambha Bhagwan).
Contrary to current, the Bishnois observe Holi as a day of grief as it is held that on this day Holika, the sister of Hiranaykshyap who was blessed to be unaffected by fire, set in a burning mound of wood with Prahalad in her lap.
To observe this event, the Bishnois don't take any food after the sunset on the day of Holi as a symbol of grief.
However, They celebrate the next day as a day of blissful joy as Lord Vishnu rescued Parahlad from the burning mound. The celebrations, though, are simple and spiritual in nature as they do Havan (Yajna) in the Bishnoi temples, take Pahal (The holy, enchanted water), offer grains and water to the birds and other wildlife and give alms to the needy.
When there is an overt hue and cry over the loss of water and use of toxic colors in the Holi festival (glamorous faces appealing people over electronic and print media), the Bishnoi way of its celebration does not only offer a safe, ecofriendly and sustainable way but also it seems to be the future of this majestic Indian festival.
Happy Holi to one and all, Lets celebrate it in Bishnoi way. Let chastity, restraint and generosity prevail and let the wildlife flourish.






Monday, 17 February 2014

सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी : विज्ञान by:RK BISHNOI

             सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी : विज्ञान

1.
लाफिंग गैस का रासायनिक नाम क्या हैं?

नाइट्रस ऑक्साइड

2.
हवा से हल्की गैस का उदाहरण दें?

हाइड्रोजन

3. हवा से भारी गैस का नाम बताएं?

कार्बन डाइऑक्साइड

4.
गोबर गैस में मुख्यत: कौन-सी गैसहोती है?

मिथेन

5.
कुकिंग गैस में कौन-सी गैस होती हैं?

प्रोपेन, ब्यूटेन

6.
चमकने वाला और माचिसों में प्रयुक्त होनेवाला पदार्थ है-—

-फास्फॉरस

7.
मनुष्य के बाद सबसे समझदार जीव किसे कहा जाता हैं?—

-डालिफन

8.
बाँस ( Bamboo) क्या हैं?

घास

9.
फलों को पकाने के लिए किस गैसका प्रयोग किया जाता हैं?—

-ऐसीटिलीन

10.
गलगण्ड (Goitre) नामक रोगकिसकी कमी से होता हैं?—

-आयोडीन

11- टीबिया नाम की हड्डी किस अंग में पाई जाती है। 

उत्तर :- टाँगों में

12-
एक बार कितने पास्केल के बराबरहोता है। 

उत्तर :- 1000000 पास्केल के

13-
दालचीनी पेड़ के किस भाग से प्राप्तकी जाती है। 

उत्तर :- छाल से

14-
मानव शरीर में ब्लड बैंक किसे कहा जाता है। 

उत्तर :- तिल्ली को

15-
सूर्य के प्रकाश में किस रंग का प्रकीर्णन सबसे अधिक होता है। 

उत्तर :- बैंगनी रंग का

16. केमिस्ट्री (रसायन) शब्द की उत्पत्ति किस देश से हुई है?

मिस्र से

17. रसायन विज्ञान के क्षेत्र मेंसर्वप्रथम नोबेल पुरस्कार किसको प्रदान किया गया?

जे. एच. वाण्टहॉक को

18.. प्रोटॉन की खोज किसने की थी?

गोल्डस्टीन ने

19. नाभिक की द्रव्यमान संख्या क्या होती है?

नाभिक में न्यूक्लियानों की संख्या

20... चट्टानों की आयु ज्ञात करने केलिए रेडियोएक्टिव आयु अंकन में 

किस समस्थानिक का उपयोग किया जाता है?

यूरेनियम का

21. चिपकाने बाले बर्तनों पर किसका लेप चड़ा होता है-

-- टेफ़लोन

22.
किस भौतिक राशि का मात्रक प्रकाश वर्ष है-

-- दूरी

23.
रेडिओ एक्टिविटी का पता सबसे किसने लगाया था-

-- हेनरी बेकुरल

24.
किस इंजन की कार्य क्षमता सबसे अधिक होती है-

-- डीजल इंजन

25.
परमाणु बम किस सिन्धांत पर आधारित है-

-- नाभकीय विखंडन

26.
विद्युत फ्यूज किस धातु का बना होता है-

-- ताम्बे तिन की मिश्र धातु से

27.
विद्युत धारा जाती है-

-- अमीटर से

28.
प्रकाश की चाल सबसे अधिक किस माध्यम होती है-

-- निर्वात