Monday, 14 August 2017

दुआई गॉधी बापू ✋ 👋

भारतमाता ग्रामवासिनी!
खेतों मैं फैला है श्यामल ,
धूल भरा मैला-सा अॉचल!
दुआई गॉधी बापू,छिमा करो😊

मैं हूँ क्योंकि हम हैं!! 💕

उबुन्टु ( UBUNTU ) एक सुंदर कथा...!

उबुन्टु ऑपरेटिंग सिस्टम
( Ubuntu Operating System )

जानते हैं, किससे प्रेरित है इस ऑपरेटिंग सिस्टम का नाम ?
👇
कुछ आफ्रिकन आदीवासी बच्चों को एक मानवविज्ञानी ने एक खेल खेलने को कहा।

उसने एक टोकनी में मिठाइयाँ और कैंडीज एक वृक्ष के पास रख दिए।

बच्चों को वृक्ष से 100 मीटर दूर खड़े कर दिया।

फिर उसने कहा कि, जो बच्चा सबसे पहले पहुँचेगा उसे टोकनी के सारे स्वीट्स मिलेंगे।

जैसे ही उसने, रेड़ी स्टेडी गो कहा.....

तो जानते हैं उन छोटे बच्चों ने क्या किया ?

सभी ने एक दुसरे का हाँथ पकड़ा और एक साथ वृक्ष की ओर दौड़ गए, पास जाकर उन्होंने सारी मिठाइयाँ और कैंडीज आपस में बराबर बाँट लिए और मजे ले लेकर खाने लगे।

जब मानवविज्ञानी ने पूछा कि, उन लोगों ने ऐंसा क्यों किया ?
 
तो उन्होंने कहा---" उबुन्टु ( Ubuntu ) "

जिसका मतलब है,

" कोई एक व्यक्ति कैसे खुश रह सकता है जब, बाकी दूसरे सभी दुखी हों ? "

उबुन्टु ( Ubuntu ) का उनकी भाषा में मतलब है,

" मैं हूँ क्योंकि, हम हैं! "

सभी पीढ़ियों के लिए एक सुन्दर सन्देश,
आइए इस के साथ सब ओर जहाँ भी जाएँ, खुशियाँ बिखेरें,

आइए उबुन्टु ( Ubuntu ) वाली जिंदगी जिएँ.....

‌" मैं हूँ क्योंकि, हम हैं..!! "👍👍👍

Thursday, 6 April 2017

Motivational Story👏👏👏

प्रेरणाप्रद कहानी

 एक 6 वर्ष का बालक अपनी 4 वर्ष की बहन के साथ एक बाजार से गुजर रहा था। अचानक बालक ने पाया कि उसकी बहन पीछे ठहर गई है। बालक ठहरा और मुड़कर पीछे देखा। उसकी बहन खिलौने की एक दुकान के सामने खड़ी थी और बड़े ध्यान से कुछ देख रही थी। बालक वापस लौटा और अपनी बहन से पूछा, ‘‘ क्या तुम कुछ चाहती हो?’’ बहन ने एक गुड़िया की ओर संकेत किया। बालक ने उसका हाथ पकड़ा और एक जिम्मेदार बड़े भाई की तरह गुड़िया उसे दे दी। बहन बहुत ज्यादा खुश हो गई। दुकानदार यह सब देख रहा था और लड़के के परिपक्व व्यवहार के देखकर आनंदित हो रहा था... अब लड़के ने काउंटर पर जाकर दुकानदार से पूछा, “ इस गुड़िया की कीमत क्या है, श्रीमान!” दुकानदार एक धैर्यवान व्यक्ति था और जीवन की समस्याओं से परिचित था। इसलिए उसने बालक से बहुत प्यार और स्नेह से कहा, “ जो भी तुम दे सकते हो?” लड़के ने अपनी जेब से वे सभी कौड़ियां बाहर निकालीं जो उसने सागर तट से एकत्र की थीं और उनको दुकानदार को दे दिया। दुकानदार ने कौड़ियों को लिया और ऐसे गिनना शुरू किया, जैसे पैसे गिन रहा हो। तब उसने बच्चे की ओर देखा। बच्चे ने चिंता से पूछा, “क्या यह कम है?” दुकानदार ने कहा, “नहीं, नहीं..ये कीमत से अधिक हैं। इसलिए मैं बाकी वापस लौटाऊंगा।” ऐसा कहकर उसने केवल 4 कौड़ियां लीं और शेष वापस कर दी। बालक ने बहुत खुशी से बाकी कौड़ियां अपनी जेब में रखीं और बहन के साथ चला गया। उस दुकान में एक नौकर यह सब देखकर बहुत आश्चर्यचकित हुआ। उसने अपने मालिक से पूछा, “ श्रीमान! आपने वह महंगी गुड़िया केवल 4 कौड़ियों के बदले में दे दी।” दुकानदार ने मुस्कुरा कर कहा, “ हमारे लिए ये केवल मामूली कौड़ियां हैं लेकिन उस बालक के लिए ये कौड़ियां बहुत मूल्यवान हैं। इस उम्र में वह नहीं समझता कि पैसा क्या होता है लेकिन जब वह बड़ा होगा तो वह निश्चित ही समझेगा। जब वह याद करेगा कि उसने एक गुड़िया को पैसों की बजाय कौड़ियों से खरीदा था तब वह मुझे याद करेगा और सोचेगा कि यह दुनिया अच्छे लोगों से भरी है। यह उसे एक सकारात्मक मनोवृत्ति विकसित करने में मदद करेगा और वह भी इस तरह से अच्छा बनने के प्रेरित होगा। ” कहानी का मूलमंत्र- जो भी भावना आप दुनिया में डालते हो वह आगे फैलती है। यदि आप अच्छा करते हैं तो अच्छाई बढ़ेगी। यदि आप खराब करते हैं तो नकारात्मकता बढ़ेगी। इस बात को महसूस कीजिए कि आप ऊर्जा के एक बहुत शक्तिशाली स्रोत हैं। अच्छाई या बुराई कई गुना बढ़कर आपके पास लौटती है। उस तरीके से नहीं जैसा कि आप चाहते हैं और न उन तरीकों से जिनकों आप समझ सकते हैं। लेकिन वह वापस लौटेगी।

Friday, 3 February 2017

राधे-२

आज तक का सबसे सुदंर मैसेज .........ये पढने के बाद एक "आह" और एक "वाह" जरुर निकलेगी...

कृष्ण और राधा स्वर्ग में विचरण करते हुए
अचानक एक दुसरे के सामने आ गए

विचलित से कृष्ण-
प्रसन्नचित सी राधा...

कृष्ण सकपकाए,
राधा मुस्काई

इससे पहले कृष्ण कुछ कहते
राधा बोल💬 उठी-

"कैसे हो द्वारकाधीश ??"

जो राधा उन्हें कान्हा कान्हा कह के बुलाती थी
उसके मुख से द्वारकाधीश का संबोधन कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया

फिर भी किसी तरह अपने आप को संभाल लिया

और बोले राधा से ...

"मै तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ
तुम तो द्वारकाधीश मत कहो!

आओ बैठते है ....
कुछ मै अपनी कहता हूँ
कुछ तुम अपनी कहो

सच कहूँ राधा
जब जब भी तुम्हारी याद आती थी
इन आँखों से आँसुओं की बुँदे निकल आती थी..."

बोली राधा -
"मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ
ना तुम्हारी याद आई ना कोई आंसू बहा
क्यूंकि हम तुम्हे कभी भूले ही कहाँ थे जो तुम याद आते

इन आँखों में सदा तुम रहते थे
कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ
इसलिए रोते भी नहीं थे

प्रेम के अलग होने पर तुमने क्या खोया
इसका इक आइना दिखाऊं आपको ?

कुछ कडवे सच , प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ?

कभी सोचा इस तरक्की में तुम कितने पिछड़ गए
यमुना के मीठे पानी से जिंदगी शुरू की और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुच गए ?

एक ऊँगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्रपर भरोसा कर लिया
और
दसों उँगलियों पर चलने वाळी
बांसुरी को भूल गए ?

कान्हा जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो ....
जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी
प्रेम से अलग होने पर वही ऊँगली
क्या क्या रंग दिखाने लगी ?
सुदर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम आने लगी

कान्हा और द्वारकाधीश में
क्या फर्क होता है बताऊँ ?

कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते
सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता

युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता है
युद्ध में आप मिटाकर जीतते हैं
और प्रेम में आप मिटकर जीतते हैं

कान्हा प्रेम में डूबा हुआ आदमी
दुखी तो रह सकता है
पर किसी को दुःख नहीं देता

आप तो कई कलाओं के स्वामी हो
स्वप्न दूर द्रष्टा हो
गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो

पर आपने क्या निर्णय किया
अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी?
और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया ?

सेना तो आपकी प्रजा थी
राजा तो पालाक होता है
उसका रक्षक होता है

आप जैसा महा ज्ञानी
उस रथ को चला रहा था जिस पर बैठा अर्जुन
आपकी प्रजा को ही मार रहा था
आपनी प्रजा को मरते देख
आपमें करूणा नहीं जगी ?

क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे

आज भी धरती पर जाकर देखो

अपनी द्वारकाधीश वाळी छवि को
ढूंढते रह जाओगे
हर घर हर मंदिर में
मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे

आज भी मै मानती हूँ

लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं
उनके महत्व की बात करते है

मगर धरती के लोग
युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं, i.
प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं

गीता में मेरा दूर दूर तक नाम भी नहीं है,
पर आज भी लोग उसके समापन पर " राधे राधे" करते है". 🙏😊☺
Must Read Once
... जय श्रीकृष्णा 👏🌹🌷

उम्दा, मन मोहक,जबरदस्त-२:नि:शब्द

 अनुरोध बस इतना है कि इसे सुकून से महसूस कर पढ़ना।

     कहानी
#आधी #परी।              
(सच्ची घटना पर आधारित)

वो पचास वर्ष की हो गयी होगी लगभग।इतना प्यार और देखभाल उसे पहले कभी नहीं मिली थी।
आज उसे अच्छी सी टेबल पर भरपूर थाली ,फल ,सलाद और मिठाई के साथ दी गयी थी।
ललित पहली बार उसके लिए नया सलवार सूट लाया था, और एक गाउन भी।वर्ना कबसे तो वो बस उतरन ही पहनती आयी थी।बस पिता ही थे जो उसे गोदी उठाते,नई फ़्रॉक लाते और मिठाई खिलाते थे।
बड़ा अज़ीब था सबकुछ।वो आदी नहीं थी अच्छे व्यव्हार की।पिछले तीन दिनों से किसी ने भी उसे झिड़का और दुत्कारा नहीं था।

हाँ वो थोड़ी मंद बुद्धि थी।चीज़ों का बहुत विश्लेषण नहीं कर सकती थी।नयी चीज़ें याद करना भी मुश्किल था,बोलने में भी तुतलाती और अटकती थी।लेकिन बीते अच्छे और बुरे पल उसे याद होते थे हमेशा।शायद इन पलों को दिल सहेजता है दिमाग नहीं इसलिए।
और मस्तिष्क कमज़ोर था उसका दिल,भावनाएं,हंसी,खुशी,सम्मान,अपमान,प्यार,दुत्कार इन सबकी अनुभूति तो थी ही उसे।
उसे वैसे परिष्कृत हाव भाव नहीं आते थे जैसे सबके थे लेकिन वो समझ सकती थी औरों के हाव भाव और बातों के पीछे छिपे प्रेम ,घृणा  और दया को भी।

वो भरी थाली को देखती रही ,हर रोज़ की तरह ही उसे माँ की बातें अब भी याद आतीं।
सम्मान,प्यार,देखरेख  की अब उसे ज़रुरत नहीं थी।जब बरसों तक कोई चीज़ जिसके हम हक़दार  हों न मिले तो प्रकृति उससे विरक्ति पैदा कर देती है।
उसे अब वही विरक्ति थी।

इन्हीं विरक्त,शून्य को तलाशती आँखों में उसके बीते हुए पल घूम रहे थे।

पिता उसके लिए वही फ़्रॉक और मिठाई लाए थे।सब कहते थे वो छह वर्ष की ढोर है।
वो रंग पहचानना तो उस वक़्त तक भी नहीं सीखी थी लेकिन पिता का प्यार वो पहचानती थी।ये फ़्रॉक उसी प्यार से रंगी थी।
उसके कदम लड़खड़ाते थे,कुछ ही वाक्य लड़खाते बोलती थी।मुँह खुला और लार बहाते रखती थी।
वो अपनी सर्वश्रेष्ठ सामर्थ्य से दौड़ते लड़खड़ाते फ़्रॉक तक आयी थी।
ताली बजाई थी,खिलखिलाई थी।
तभी माँ ने फ़्रॉक को उठा कर दूर फेंक दिया था।

"कुलक्षिणी,बोदा, बड़ी फ़्रॉक पहनेगी।
लार बहाना तो बंद कर ले।
गधी से न तो बोलना आता न तमीज़।"

वो सहम गयी थी।
पापा ने उसके लिए लड़ाई भी की थी माँ से,और उसे गले से चिपका कर आंसू भी बहाये थे।माफ़ कर दो मुझे जैसा भी कुछ कहा था।

बड़े होते होते उसे अपनी कहानी पता चल ही गई थी कि आखिर वो ऐसी क्यों है।छोटे भाई ललित जैसी सुन्दर,दौड़ सकने,साइकिल चला सकने,अच्छे से बोल सकने और पढ़ाई कर सकने लायक क्यों नहीं।
उसकी कहानी उसे इसलिए पता चली थी क्योंकि जो भी घर में आता उसे देखते ही पहला प्रश्न ये पूछता, "क्या हुआ था इसे?'
"क्या ये मंदबुद्धि है?"
"एक तो लड़की जात ऊपर से ऐसी।क्या होगा च् च् च्......."
उनकी सहानुभूति अवचेतन में छुपी खुशी सी होती, मानो दिल कहना चाह रहा हो चलो हम और हमारे बच्चे बच गए प्रकृति के इस प्रकोप से।
पिछले जन्म के पाप के विषय में भी चर्चाएं शुरू हो जातीं।

और जवाब में माँ विस्तार से हर बार बताती।

"इसकी महतारी तो मर गई जनम के समय लेकिन हमारे सर पर इसे पटक गयी।
बोलते हैं  देर से रोई थी तो दिमाग को ऑक्सीजन कम
हो गया।उससे ऐसी पगला गयी।"

उसके देर से रोने की सज़ा जीवनभर के आंसू होने वाले थे।
कितनी ही बार माँ कहती "काहे जनम लिया तूने।अपनी माँ के साथ तब ही नहीं मर सकती थी।
आखिर ऐसी ज़िंदगी का मतलब ही क्या।क्यों लेते है जन्म ऐसे बच्चे।"

हाँ उसकी माँ की मृत्यु के एक वर्ष बाद ही पापा ,माँ को ले आये थे।
आखिर लाये वो उन्हें उसके लिए ही थे।आखिर कैसे पालते।
अकेली माएं तो बच्चे पाल लेती हैं लेकिन अकेले पिता नहीं।प्रकृति ने बड़ा कमज़ोर बनाया है इस मामले में पुरुष को।

माँ एक साल तक तो ठीक रही ,लेकिन उसके तीन बर्ष के होते होते ललित आ गया था उनकी गोद में।
अब दो बच्चों को पालना उसपर भी एक बच्ची ऐसी।
मंदबुद्धि।अब भी बिस्तर पर सबकुछ करने वाली।
कटोरी में खाना दो तो पूरे फर्श में फैला देने वाली।
और माँ बदलने लगी।
वो जितना ललित को प्यार करती उतना ही उसे दुत्कारती।
माँ को लगता वो अड़ंगा है ललित की परवरिश में।

लेकिन उसे तो ललित बड़ा प्यारा लगता।
उसका पहला खिलौना। मोटा सा ,गोरा गोरा।
जब वो लड़खड़ा कर चलती तब ललित घुटने के बल चलता।
वो उसकी तरफ बॉल लुढ़काता तो वो खिलखिलाती।

धीरे धीरे दोनों बड़े होने लगे। ललित धीमे और वो बहुत धीमे...।
ललित प्यार से पल रहा था और वो दुत्कार से।
ललित हालाँकि उसे दीदी ही बोलता। प्यार करता, रक्षा करता।उसका खिलौना बड़ा हो गया था और वो छोटी ही रह गयी थी।ललित अब स्कूल और बाहर दोस्तों के साथ ज़्यादा खेलता। वो पुराने हो चुके खिलौने सी बैठी रहती घर में।
पापा ने उसका दिमाग बढ़ाने एक पज़ल सा खिलौना  ला कर दिया था।  आधा टुकड़ा ललित को और आधा उसे दिया था।दोनों को मिलाने पर एक परी बन जाती थी।
वो उसे शुरू में बहुत मुश्किल से जोड़ पाती थी,ललित तुरंत।लेकिन धीरे धीरे वो भी सीख गयी थी आसानी से जोड़ना।उस पज़ल से दिमाग बढ़ा था कि नहीं ये तो नहीं पता लेकिन उसे खुद वो ललित के बिना अधूरी लगने लगी थी।ललित का आधा टुकड़ा ही उसे सम्पूर्ण करता।
लेकिन एक दिन ललित ने आधी पज़ल गुमा दी थी।
वो गुमसुम हो गयी थी।जैसे टूट गयी हो खुद।आधी परी।

स्कूल भेजने की कोशिश की गयी थी उसे भी।लेकिन वो एक अलग दुनिया थी उसके लिए।दो दिन भी नहीं रह पाई थी वहां।
हाँ ललित ने ही नाम लिखना सिखा दिया था।वो दिन भर अपना नाम लिखती रहती।
ललित से उसने एक बार पूछा था लडख़ड़ाती ज़बान से
"भाई मंदबुद्धि कैसे लिखते हैं।"

ललित का जन्मदिन मनाया जाता,उसे संगीत पसंद था,अपने कमरे में थिरकती ताली बजा बजा कर,लेकिन जन्मदिन में शामिल होने की अनुमति नहीं थी उसे।माँ को उसे चिढ़ाये जाने और शर्म का अहसास होता।

उसके सुकून के पल पापा के आने पर होते।जब पापा दोनों को गोदी उठाते।
ललित उसे कितना प्यार करता है उसने तब जाना था जब वो एकबार बाहर आ गई थी , वो क्रिकेट खेल रहा था।
और एक बच्चे ने कह दिया था  "तेरी बहन पागल है।"

और ललित भिड़ गया था उससे।
अपने से बड़े लड़के से।
उसे खरोंचें आयी थीं और माँ से दोनों को बहुत डांट पड़ी थी।
मुझे कहीं ज़्यादा।
माँ ने कहा था "पगलिया को पागल नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे लोग।बुचड़ी क्यों गयी थी बाहर नाक कटाने।
और मेरा बाहर निकलना बिलकुल बंद करवा दिया था।"

और ऐसे ही उसका  बचपन बीता था।
उसकी जवानी न तो आईनों, कपड़ों मेकअप के साथ थी न कॉलेज, कैंटीन ,फिल्मों में।
क्या पता उसे लड़के पसंद आते थे भी या नहीं।क्या प्रेम की आकांक्षा इन्हें भी होती होगी?होती भी हो तो क्या,प्यार पाने के अधिकार तो ये बच्चे तब ही खो चुके होते हैं जब ये जी जाते हैं, मरते मरते।
जवानी में उसपर सबके सामने आने  पर पूरे पहरे लगा दिए गए थे।
ललित की शादी के समय उसने सजी ,धजी खूबसूरत दुल्हन देखी थी,सब कित्ती सुन्दर है,कित्ती प्यारी है बोल रहे थे।
और तब ही वो खुद भी गाढ़ी फ़ैली हुई लिपस्टिक पोत आई थी सबके सामने।

सब उसे देख कर खूब हंसे थे।
वो रुक कर पहले उन्हें हँसते देख रही थी।उसका छोटा सा दिमाग इस हंसी के पीछे के मतलब को प्रोसेस कर रहा था।उसे लगा था लिपस्टिक के बाद उसे भी कहा जायेगा कित्ती सुन्दर लग रही है,लेकिन सब हंसे थे।
जब छोटे दिमाग ने प्रोसेस कर लिया तो वो भी हंसी थी थोड़ा शर्माकर।

ललित की दुल्हन अच्छी थी ।कहीं जॉब करती थी।
अच्छी लेकिन बहुत व्यस्त।उससे वो घृणा वाले शब्द उसने कभी नहीं कहे थे।लेकिन सच तो ये है कि उसने कभी कुछ कहा ही नहीं था।वो कौने में रखा स्टूल थी उसके लिए।धुल लगा स्टूल जिसे छूने से हाथ गंदे हो जाते।
ललित भी व्यस्त होते चला गया।
अब उससे दुर्व्यवहार तो कोई नहीं करता था।माँ भी नहीं लेकिन उपेक्षा खुद भी तो सजा ही होती है।
अकेली कौने में बैठी, खिड़की से देखती रहती बाहर बच्चों को खेलते हुए।।
बचपन में सहानुभूति दिखाने वाली आवाज़ें भी धीरे धीरे ख़त्म हो गयी थीं।

और यूँ ही जवानी भी कट  गयी थी।
सच तो पूछती थी माँ आखिर तू क्यों बच गयी।तू क्यों न मर गयी।

उद्देश्यहीन ,अनुपयोगी जीवन।बस खाना, जागना और सोना यह चक्र चलते पचास वर्ष हो गए थे और आज अचानक उसे सम्मान और अच्छा खाना मिला था।

माँ ने अब कोसना न के बराबर कर दिया था,काफी बूढ़ी और कमज़ोर जो हो गयी थीं।
पिता जब नहीं रहे ,वो रोई नहीं थी।क्योंकि उसका वही छोटा सा दिमाग, प्रोसेस नहीं कर पाया था मौत और उसके मतलब को।
बहुत दिनों तक अब भी वो पहले की ही तरह उनकी आवाज़ की प्रतीक्षा करती रोज़ शाम।

थोड़ा सा खाना ख़त्म कर वो बैठी ही थी कि माँ पास आयी।बूढ़ी ,लेकिन अब भी दिमाग वैसा ही तेज़।
पहली बार शायद नाम लिया था माँ ने ,वरना उसका तो नाम ही मंदबुद्धि रख दिया था माँ ने।

पिछले एक हफ्ते से फ़ैली अज़ीब मनहूसियत और उस पर उसकी ये देखभाल।पुराने खिलौने को जैसे किसी ने झाड़ पोंछ कर फिर से सजा दिया था उजड़े मकान में।
उसकी इस देख रेख के पीछे कहीं, कुछ छुपा था।वो अहसास कर सकती थी। बेचैनी,असमंजस कशमकश जैसे शब्द उसे कहाँ पता थे ,लेकिन ये थे तो उसी की भीतर।और इस घर की दीवारों के भीतर।
सबके बुझे चेहरे, ऊपरी मुस्कराहट तले ढंके थे।

आखिर अब उसे समझ आने ही वाला था।
माँ  सर पर हाथ रख बोली थी  "बेटा मैं जीवन भर तुझे कहती रही तू क्यों जी गयी।क्यों मर न गयी।"

आज समझ आया मुझसे कितना बड़ा पाप हुआ है।

चल डॉक्टर के पास।

ललित ,बहू और माँ तीनों उसे लेकर डॉक्टर के पास गए थे।

डॉक्टर कौशल एक जाने माने कैंसर रोग विशेषज्ञ थे।
उन्होंने मुस्कुरा कर कहा "अच्छा! ले आये आप इन्हें।
ये बहन हैं आपकी?"

"ठीक है फिर हम कोशिश कर सकते हैं।"

माँ ने पुछा था "डॉक्टर ललित ठीक तो हो जायेगा न।
और हमें भी थोडा सा समझा दें ये क्या बीमारी है।"

डॉक्टर ने कहा था

"माँ जी क्रोनिक माइलॉयड ल्युकेमिया नाम का ब्लड कैंसर है ललित को।
ये धीमे धीमे आगे बढ़ने वाला कैंसर है।
बोन मेरो ट्रांसप्लांटेशन ही एक मात्र परमानेंट उपचार है।
हालाँकि बोन मेरो ट्रांसप्लांट में दिक्कत ये है कि ये मैच होना चाहिए साथ ही कुछ खतरा भी होता है।
बोन मेरो मैच होने की सम्भावना भाई बहन में ज़्यादा होती है।और ललित के केस में तो और किसी से लिया ही नहीं जा सकता क्योंकि आप की उम्र ज़्यादा है और आनुवंशिक रूप से कोई और करीबी संबंधी नहीं है।
ललित ने बताया था एक ही बहन है,तो मैंने कहा कोशिश कर लेते हैं।"

"लेकिन हाँ डोनर की सहमति आवश्यक है मिलान के पहले।"

और उससे डॉक्टर ने कहा था "बोनमेरो की जांच में थोड़ा दर्द होगा आपको ,क्या आप करवाओगी?"

उसके उसी छोटे से दिमाग ने बस इतना प्रोसेस किया था इस बार कि इन्हें ललित के लिए मुझसे कुछ चाहिए ,कुछ ऐसा कि मुझे दर्द होगा।

वो उत्तर में बस हंसी थी।
दो दिन बाद बोनमेरो मैच हो गया था
अस्पताल के सहमति पत्र में उसने वही उबड़ खाबड़ हस्ताक्षर कर दिए थे जो ललित ने सिखाये थे।उसे ललित से तब ही बहुत प्यार हो गया था जब उसे खरोंचें लगीं थी लड़ाई में।वो आधी परी को छुपाये हुए थी बायीं मुट्ठी में।आधी परी का बोनमैरो ललित में मिलकर उसे पूरा बना रहा था।

वो क्यों मर न गयी तब ही ये उसको और माँ को समझ आ गया था।

।।अव्यक्त।।